अमेरिका एक तरफ भारत से कहता है कि रूस से तेल मत खरीदो। दूसरी तरफ वह खुद रूस से यूरेनियम खरीद रहा है। यही है अमेरिका का दोहरा रवैया, जो अब पूरी दुनिया के सामने खुलकर आ गया है। हाल ही में अमेरिकी संसद ने एक नया कानून पास किया है, और उसी कानून में यह दोहरापन साफ नज़र आ रहा है।
अमेरिका का दोहरा रवैया आखिर है क्या?
बात सीधी है। अमेरिका चाहता है कि भारत और चीन रूस से तेल और गैस खरीदना बंद कर दें। इसके लिए वह भारी टैरिफ यानी आयात शुल्क लगाने की धमकी दे रहा है। मगर जब बात अपने देश की आती है, तो अमेरिका खुद रूस से परमाणु ईंधन यानी यूरेनियम लेना जारी रखे हुए है। इसी वजह से लोग इसे अमेरिका का दोहरा रवैया कह रहे हैं।
ग्राहम एक्ट 2026 में छिपा है अमेरिका का दोहरा रवैया
16 सितंबर 2026 को अमेरिकी संसद के निचले सदन ने एक कानून पास किया। इसका नाम है Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026. यह बिल 262 के मुकाबले 159 वोटों से पास हुआ। इससे पहले अगस्त 2026 में अमेरिकी सीनेट ने भी इसे 86-11 वोटों से मंजूरी दे दी थी। अब यह बिल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर का इंतजार कर रहा है।
इस कानून के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार मिलता है कि वे रूस से बड़ी मात्रा में तेल या गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगा सकें। भारत और चीन इस सूची में सबसे ऊपर हैं। लेकिन इसी कानून के एक हिस्से में अमेरिका ने अपने लिए राहत भी रख ली है। यही असली अमेरिका का दोहरा रवैया है।
यूरेनियम में छूट, तेल में सख्ती: अमेरिका का दोहरा रवैया एक और सबूत
कानून के सेक्शन 111 में कहा गया है कि रूस की कंपनी रोसाटॉम से यूरेनियम आयात पर रोक लगनी चाहिए। लेकिन उसी कानून के सेक्शन 114 में एक छूट भी दी गई है। इसके मुताबिक, अमेरिका और रूस के बीच पुराने परमाणु समझौतों के तहत यूरेनियम का आयात जारी रह सकता है। कुछ मेडिकल आइसोटोप के आयात को भी छूट मिली है। जानकार इसे अमेरिका का दोहरा रवैया मानते हैं, क्योंकि एक तरफ भारत के लिए सख्ती है, दूसरी तरफ खुद के लिए नरमी।
2024 का यूरेनियम बैन भी अधूरा था
यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका ने ऐसा किया हो। साल 2024 में अमेरिका ने Prohibiting Russian Uranium Imports Act नाम का कानून बनाया था। इसके तहत 11 अगस्त 2024 से रूस से लो-एनरिच्ड यूरेनियम यानी LEU के आयात पर रोक लगा दी गई थी। लेकिन इसमें भी एक रास्ता खुला रखा गया। अमेरिकी ऊर्जा विभाग को यह अधिकार दिया गया कि वह जरूरत पड़ने पर छूट दे सकता है। यह छूट तब मिलती है जब कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध न हो, या आयात को राष्ट्रीय हित में माना जाए। यह छूट व्यवस्था 1 जनवरी 2028 तक चल सकती है। यहां भी अमेरिका का दोहरा रवैया साफ नजर आता है।
आंकड़े बताते हैं असली सच्चाई
अमेरिका की अपनी ऊर्जा सूचना एजेंसी यानी US Energy Information Administration के आंकड़े कुछ और ही कहानी बताते हैं।
साल | अमेरिका में रूसी यूरेनियम का हिस्सा |
| 2021 | करीब 20% (सीनेटर बैरासो के अनुसार) |
| 2025 | करीब 26% (US EIA डेटा) |
साल 2025 में अमेरिकी परमाणु ऊर्जा संयंत्रों ने कुल 12.71 मिलियन सेपरेटिव वर्क यूनिट यानी SWU की एनरिचमेंट सेवाएं खरीदीं। इनमें से करीब 26 प्रतिशत हिस्सा अकेले रूस से आया। यह आंकड़ा खुद अमेरिका का दोहरा रवैया उजागर करता है।
सीनेटर ने भी 2022 में उठाई थी आवाज
यह मुद्दा नया नहीं है। साल 2022 में अमेरिकी सीनेटर जॉन बैरासो ने वॉल स्ट्रीट जर्नल में एक लेख लिखा था। उन्होंने लिखा था कि अमेरिका के 90 प्रतिशत से ज्यादा परमाणु ईंधन का आयात होता है, और रूस इसका तीसरा सबसे बड़ा सप्लायर है। उस साल अमेरिका ने रूस को यूरेनियम के बदले करीब 1 अरब डॉलर दिए थे। यही वजह है कि आज फिर से अमेरिका का दोहरा रवैया चर्चा में है।
भारत ने क्या कहा?
भारत के विदेश मंत्रालय ने इस मामले पर संयमित लेकिन साफ प्रतिक्रिया दी है। मंत्रालय ने कहा कि भारत इस कानून पर नजर बनाए हुए है, और अपने 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अलग-अलग स्रोतों से तेल खरीदता रहेगा। यह मुद्दा अमेरिका के साथ ऊंचे स्तर की बातचीत में भी उठाया जा चुका है। भारत ने साफ कर दिया कि वह अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा।
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चीन पर भी असर
इस कानून का असर सिर्फ भारत पर नहीं, चीन पर भी पड़ेगा। रिपोर्टों के मुताबिक, इस सूची में शामिल देशों में चीन सबसे ज्यादा रूसी ऊर्जा खरीदता है। लेकिन सवाल फिर वही है - जब अमेरिका खुद रूस से यूरेनियम ले रहा है, तो दूसरे देशों से पूरी तरह रूस छोड़ने की उम्मीद कितनी सही है? यही अमेरिका का दोहरा रवैया इस पूरे मामले की सबसे बड़ी बहस बन गया है।
पहले भी भारत को दी गई थी नसीहत
यह पहला मौका नहीं है जब अमेरिका ने भारत को रूस से दूरी बनाने की सलाह दी हो। साल 2022 में, जब रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ था, अमेरिका ने भारत से कहा था कि सस्ता रूसी तेल खरीदना 'इतिहास की किताबों' में गलत साबित होगा। उस समय भारत सिर्फ 2-3 प्रतिशत तेल रूस से खरीदता था। बाद के सालों में छूट ज्यादा मिलने से भारत की रूसी तेल खरीद काफी बढ़ गई। अगस्त 2025 में भी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर टैरिफ बढ़ाने की बात कही थी। इससे भी अमेरिका का दोहरा रवैया पुराना मामला साबित होता है।
क्या यह सिर्फ भारत के साथ हो रहा है?
यह सवाल अब कई जानकार पूछ रहे हैं। जब अमेरिका खुद मानता है कि उसकी परमाणु इंडस्ट्री को रूस से अलग होने में समय लगेगा, तो वह भारत से यह उम्मीद कैसे रख सकता है कि वह रातों-रात रूस से तेल खरीदना बंद कर दे? भारत का तर्क है कि उसकी 1.4 अरब की आबादी की ऊर्जा ज़रूरतें भी उतनी हीज़रूरीी हैं। यही तुलना अमेरिका का दोहरा रवैया साबित करने के लिए काफी है।
अमेरिका की नीति पर और भी सवाल
अमेरिका की विदेश नीति में इस तरह के दोहरे मापदंड नए नहीं हैं। हाल ही में अमेरिका और सऊदी अरब के बीच लड़ाकू विमान की डील को लेकर भी सवाल उठे थे।
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इससे भी साफ होता है कि अमेरिका अपनी रणनीतिक जरूरतों के हिसाब से नियम बदलता रहता है, और यही अमेरिका का दोहरा रवैया बार-बार सामने आता है।
आगे क्या होगा?
अब सबकी नजर इस बात पर है कि राष्ट्रपति ट्रंप इस बिल पर दस्तखत कब करते हैं। भारतीय रिफाइनरी कंपनियों ने सितंबर-अक्टूबर के लिए पहले से ही कुछ रूसी कच्चा तेल बुक कर लिया है। कंपनियों का कहना है कि अगर रूसी तेल अचानक बंद हुआ, तो कीमतें और बढ़ सकती हैं। जब तक अमेरिका खुद अपनी यूरेनियम नीति नहीं बदलता, तब तक अमेरिका का दोहरा रवैया वाली बहस खत्म नहीं होगी।
संक्षेप में समझें
मुद्दा | भारत के लिए नियम | अमेरिका के लिए नियम |
| तेल-गैस | 100% तक टैरिफ की धमकी | कोई प्रतिबंध नहीं |
| यूरेनियम | लागू नहीं | छूट के तहत आयात जारी |
| तर्क | ऊर्जा सुरक्षा, 1.4 अरब आबादी | राष्ट्रीय हित, विकल्प न होना |
इस तुलना से भी अमेरिका का दोहरा रवैया आसानी से समझ आता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. ग्राहम एक्ट 2026 क्या है?
यह अमेरिकी कानून है जो राष्ट्रपति को रूस से तेल-गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। इसी कानून में यूरेनियम को लेकर छूट भी दी गई है, जिसे लोग अमेरिका का दोहरा रवैया बता रहे हैं।
2. अमेरिका रूस से यूरेनियम क्यों खरीदता है?
अमेरिका के परमाणु प्लांट अभी भी काफी हद तक रूस की एनरिचमेंट सेवाओं पर निर्भर हैं। 2025 में करीब 26 प्रतिशत सप्लाई रूस से आई।
3. क्या भारत पर टैरिफ लगना तय है?
नहीं, यह टैरिफ अपने आप नहीं लगेगा। इसके लिए राष्ट्रपति को अलग से फैसला लेना होगा। लेकिन खतरा बना हुआ है, और इसी वजह से अमेरिका का दोहरा रवैया सुर्खियों में है।
4. भारत ने इस पर क्या रुख अपनाया है?
भारत ने कहा है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अलग-अलग स्रोतों से तेल खरीदता रहेगा, और अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करेगा।
5. क्या यह पहली बार है जब अमेरिका पर दोहरे रवैये का आरोप लगा है?
नहीं। साल 2022 में भी सीनेटर जॉन बैरासो ने रूस पर अमेरिका की यूरेनियम निर्भरता को लेकर सवाल उठाए थे। अब 2026 में एक बार फिर अमेरिका का दोहरा रवैया चर्चा में है।