Barclays से लेकर Rothschild तक: लंदन में बड़े बैंकों के सामने क्यों गिड़गिड़ा रहे हैं पाकिस्तानी PM?
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ लंदन पहुंचे। एक ही दिन में वे पांच बड़ी वित्तीय कंपनियों के अधिकारियों से मिले। Barclays से लेकर Rothschild तक, हर जगह एक ही बात हुई: "पाकिस्तान में निवेश कीजिए।" सोशल मीडिया पर सवाल उठा कि क्या यह मदद की भीख है? एक और सवाल ज़्यादा तीखा था। कुछ लोग पूछ रहे हैं कि जिस नाम पर पाकिस्तान में अक्सर गुस्सा दिखता है, उसी से पैसे की उम्मीद क्यों? इस रिपोर्ट में सिर्फ़ तथ्य हैं। Barclays से लेकर Rothschild तक की पूरी कहानी पढ़िए।
लंदन में उस दिन असल में क्या हुआ?
तारीख़ थी 29 सितंबर 2026। शहबाज़ शरीफ़ लंदन स्टॉक एक्सचेंज पहुंचे और ट्रेडिंग सत्र की शुरुआत कराई। वे ऐसा करने वाले पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने। उन्होंने 3 अरब डॉलर के यूरोबॉन्ड का औपचारिक उद्घाटन भी किया।
फिर बैठकों का सिलसिला चला। Barclays से लेकर Rothschild तक की सारी बैठकें एक ही दिन में हुईं। वित्त मंत्री मोहम्मद औरंगज़ेब और निजीकरण सलाहकार मोहम्मद अली साथ थे।
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किन बैंकों और किन अधिकारियों से मिले पीएम?
| कंपनी | अधिकारी | चर्चा का विषय |
| Barclays | मोहम्मद कमाल सैयद, हेड, प्राइवेट बैंक और वेल्थ मैनेजमेंट UK | वित्तीय क्षेत्र में अवसर |
| J.P. Morgan | मैथ्यू विल्ट्ज़, EMEA के सह-सीईओ | कैपिटल मार्केट, ट्रेड फ़ाइनेंस |
| Citi | डेविड लिविंगस्टन, चीफ़ क्लाइंट ऑफ़िसर | कॉरपोरेट बैंकिंग का विस्तार |
| BlackRock | प्रतिनिधिमंडल | शेयरों और बॉन्ड में ज़्यादा निवेश |
| Rothschild & Co | लॉर्ड मार्क सेडविल, माजिद इशाक | भू-आर्थिक प्राथमिकताएं, सलाह |
Barclays से लेकर Rothschild तक की सूची देखिए। हर कंपनी का काम कर्ज़, निवेश या सलाह है। Barclays से लेकर Rothschild तक, किसी का नाम धर्म देखकर चुना गया नहीं लगता। हर बैठक कारोबार की थी।
Barclays के साथ बैंकिंग सेवाओं पर बात हुई। J.P. Morgan से सरकारी कर्ज़ बाज़ार और कॉरपोरेट बैंकिंग में साझेदारी पर चर्चा हुई। Rothschild & Co के साथ चर्चा पूंजी बाज़ार की सलाह पर रही।
पाकिस्तान को विदेशी पैसे की इतनी ज़रूरत क्यों है?
आंकड़े जवाब देते हैं:
- जुलाई-अगस्त में व्यापार घाटा 7.1 अरब डॉलर रहा।
- इस वित्त वर्ष में बाहरी वित्तीय ज़रूरत 21.5 अरब डॉलर है।
- चीनी कर्ज़ चुकाने के बाद विदेशी मुद्रा भंडार करीब 17 अरब डॉलर रहा।
- एक संपादकीय के अनुसार बीते तीन साल में राजकोषीय घाटा करीब 5% और विकास दर 3% से कम रही।
इसीलिए सरकार बाज़ार से पैसा जुटा रही है। यूरोबॉन्ड यानी डॉलर में लिया गया कर्ज़। निवेशक पैसा देते हैं और ब्याज पाते हैं।
सितंबर 2026 की शुरुआत में पाकिस्तान ने दो हिस्सों वाला बॉन्ड बेचा। 5.5 साल के बॉन्ड से 1.75 अरब डॉलर 7.50% पर मिले। 10 साल के बॉन्ड से 1.25 अरब डॉलर 7.90% पर मिले। मांग लगभग 6 अरब डॉलर की थी। वित्त मंत्रालय के अनुसार यह किसी एक
सौदे में देश की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय बॉन्ड बिक्री है। ये सरकारी दावे हैं, पर दोगुनी मांग एक ठोस संकेत है।
Barclays से लेकर Rothschild तक की दौड़ का कारण यही है। बॉन्ड बेचने और निवेश लाने के लिए बड़े बैंकों का भरोसा चाहिए।
सरकारी बयानों में कौन-से शब्द इस्तेमाल हुए?
प्रधानमंत्री कार्यालय के बयानों में "आमंत्रित किया" और "प्रोत्साहित किया" जैसे शब्द हैं। BlackRock से शेयरों और फिक्स्ड इनकम में हिस्सेदारी बढ़ाने की अपील हुई। दोनों पक्षों ने नीतियों में निरंतरता पर ज़ोर दिया।
सरकार के अनुसार अधिकारियों ने सुधारों पर भरोसा जताया। यह सरकारी दावा है। उपलब्ध रिपोर्टों में किसी तय निवेश रक़म का ज़िक्र नहीं है। Barclays से लेकर Rothschild तक, किसी ने रक़म का ऐलान नहीं किया।
दोनों पक्षों की बात:
- समर्थक: निवेश के लिए बैंकों से मिलना सामान्य तरीका है। बॉन्ड की मांग भी दोगुनी रही।
- आलोचक: हर बॉन्ड एक कर्ज़ है। 7.5% और 7.9% का ब्याज बड़ा बोझ है। विकास दर कम है।
Rothschild & Co असल में है क्या?
कहानी फ़्रैंकफ़र्ट से शुरू होती है। 18वीं सदी में मेयर एम्शेल रोथ्सचाइल्ड वहां के यहूदी मोहल्ले से निकले और बैंकिंग में नाम कमाया। उनके बेटे लंदन, पेरिस, नेपल्स और वियना जा बसे और वहां अपने कारोबार खड़े किए। जब परिवार यूरोप की सरकारों को पैसा देने लगा, तो उसकी दौलत लोगों को खटकने लगी।
यहीं से अफ़वाहें शुरू हुईं। 1840 के दशक में पेरिस के पर्चों ने इस परिवार को लालची साज़िशकर्ता की तरह दिखाया। एक मशहूर किस्सा है कि वाटरलू की जंग का नतीजा पहले जानकर परिवार ने भारी कमाई की। इस विषय पर किताब लिखने वाले एक लेखक के अनुसार ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था। "परिवार ने हर जंग में दोनों तरफ़ पैसा दिया" वाला वाक्य भी नाथन रोथ्सचाइल्ड ने कभी नहीं कहा। एक रिपोर्ट के मुताबिक इसकी जड़ 1939 का एक झूठा उद्धरण है। इतिहासकार ऐसी बातों को यहूदी-विरोधी मिथक मानते हैं।
आज का Rothschild & Co इन किस्सों से बहुत अलग है। इसे 2012 में फ्रांस और इंग्लैंड की पारिवारिक हिस्सेदारियां जोड़कर बनाया गया। इसके तीन मुख्य काम हैं: कंपनियों और सरकारों को सलाह देना, वेल्थ और एसेट मैनेजमेंट, और मर्चेंट बैंकिंग। परिवार ने 2023 में इसे शेयर बाज़ार से हटाकर निजी बना लिया। रॉयटर्स के अनुसार इस सौदे में Chanel के मालिकों और Peugeot और Dassault जैसे फ्रांस के बड़े परिवारों ने भी साथ दिया। एक रिपोर्ट के अनुसार करीब 40 देशों में इसके लगभग 60 दफ़्तर हैं। फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी कभी इसकी इन्वेस्टमेंट बैंकिंग शाखा में काम कर चुके हैं।
Barclays से लेकर Rothschild तक, लंदन में जिन नामों से बात हुई, उनमें यह भी एक वैश्विक सलाहकार कंपनी है। यह कोई सरकार या धार्मिक संस्था नहीं है।
पाकिस्तान में यहूदी-विरोधी सोच और Rothschild से बातचीत: दोनों साथ कैसे?
यह इस पूरी बहस का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। सवाल सीधा है: जिस देश में यहूदियों के प्रति इतनी नाराज़गी दिखती है, उसका प्रधानमंत्री पैसे के लिए Rothschild जैसे नाम के पास क्यों गया?
पहले यह मानना होगा कि इस सवाल का आधार खोखला नहीं है। अमेरिकी संस्था Pew Research Center के 2008 के सर्वे में 76% पाकिस्तानियों ने यहूदियों के बारे में बुरी राय बताई। अच्छी राय रखने वाले दस में से एक से भी कम थे। 2009 के सर्वे में बुरी राय वालों का आंकड़ा 78% हो गया। ये आंकड़े पुराने हैं। हमें इस खोज में कोई ताज़ा सर्वे नहीं मिला। फिर भी ये दिखाते हैं कि नकारात्मक सोच कम लोगों तक सीमित नहीं है।
इसके पीछे राजनीति भी है। पाकिस्तान इज़राइल को मान्यता नहीं देता और दोनों के बीच राजनयिक संबंध नहीं हैं। उसका रुख़ है कि फ़िलिस्तीन मसले का न्यायपूर्ण हल मिलने तक वह मान्यता नहीं देगा। 2022 में विदेश कार्यालय ने कहा कि इस नीति पर "पूरी राष्ट्रीय सहमति" है। एक पुरानी रिपोर्ट के अनुसार इज़राइल का विषय पाकिस्तान में बेहद संवेदनशील है। उसी रिपोर्ट में कहा गया कि कुछ टिप्पणीकार बिना सबूत देश की समस्याओं के लिए भारत और इज़राइल की एजेंसियों को ज़िम्मेदार ठहराते रहे हैं।
एक बात पर ईमानदार रहना ज़रूरी है। सर्वे लोगों की राय नापते हैं। वे यह नहीं बताते कि राय किसने बनाई। इसलिए किसी एक नेता, संस्था या मीडिया को इसका ज़िम्मेदार ठहराने का आधार हमारे पास नहीं है।
अब असली सवाल पर आते हैं। इस बैठक में पाकिस्तान किसी समुदाय के पास नहीं गया। वह एक वित्तीय कंपनी के पास गया, जो सरकारों को पूंजी बाज़ार की सलाह देती है। उसी दिन चार और बैंकों से भी बात हुई। किसी आधिकारिक बयान में धर्म का ज़िक्र तक नहीं है।
पैसा भी किसी एक कंपनी से नहीं आता। सितंबर के यूरोबॉन्ड की मांग मुख्य रूप से पेंशन फ़ंड और म्यूचुअल फ़ंड जैसे संस्थागत निवेशकों से आई। पाकिस्तान को अपना कर्ज़ चलाने के लिए इसी वैश्विक बाज़ार में जाना पड़ता है। Barclays से लेकर Rothschild तक की बैठकें इसी मजबूरी और कोशिश का हिस्सा हैं।
यह सवाल भी देखिए: "यहूदियों से पैसा क्यों मांगते हैं?" इसमें अनजाने में वही पुराना मिथक छिपा है कि पैसा किसी एक समुदाय के पास रहता है। Barclays, J.P. Morgan, Citi या BlackRock के बारे में कोई यह सवाल नहीं पूछता।
फिर भी एक जायज़ बहस बचती है। जनता की भावना एक तरफ़ है और सरकार की आर्थिक मजबूरी दूसरी तरफ़। अगर कोई नेता मंच पर कड़ी भाषा बोले और बंद कमरे में हर कंपनी से बात करे, तो जनता संदेश की संगति पर सवाल पूछ सकती है। यह राजनीतिक सवाल है। इससे किसी धर्म पर आरोप का आधार नहीं बनता। किसी भी धर्म के लोगों के ख़िलाफ़ नफ़रत ग़लत है।
Barclays से लेकर Rothschild तक की इस चर्चा में तथ्य यही हैं।
अब आगे किन बातों पर नज़र रखें?
- क्या कोई बैंक तय रक़म लगाने की घोषणा करता है?
- क्या IMF कार्यक्रम की शर्तें निभाई जाती हैं?
- क्या विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ता है?
- क्या नीतियां स्थिर रहती हैं? BlackRock की बैठक में इसी पर ज़ोर था।
यही तय करेगा कि Barclays से लेकर Rothschild तक की मुलाक़ात कागज़ पर रहेगी या ज़मीन पर दिखेगी।
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Conclusion
29 सितंबर 2026 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने लंदन में पांच बड़ी वित्तीय कंपनियों से बात की। मकसद निवेश और बाज़ार में भरोसा बढ़ाना था। पीछे बड़ी बाहरी ज़रूरत है और 3 अरब डॉलर के यूरोबॉन्ड की हालिया सफलता भी। बयानों में "आमंत्रण" की भाषा है, "भीख" की नहीं। फिर भी आलोचक कर्ज़ के बोझ पर सवाल उठाते रहेंगे।
यहूदी नाम वाली बहस का जवाब यह है कि यह कंपनी और कारोबार का मामला है। पाकिस्तान की इज़राइल पर नीति राजनीतिक है और Rothschild & Co एक निजी वित्तीय समूह है। इसे धर्म से जोड़ना तथ्य नहीं है। Barclays से लेकर Rothschild तक की यह कहानी तथ्यों से ही समझनी चाहिए।
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FAQs
1. पाकिस्तानी पीएम लंदन में किन कंपनियों से मिले?
Barclays, J.P. Morgan, Citi, BlackRock और Rothschild & Co से। बैठकें 29 सितंबर 2026 को हुईं।
2. क्या पाकिस्तान इज़राइल को मान्यता देता है?
नहीं। दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध नहीं हैं। पाकिस्तान फ़िलिस्तीन मसले के न्यायपूर्ण हल की शर्त रखता है।
3. क्या Rothschild & Co इज़राइली सरकार की कंपनी है?
नहीं। यह पेरिस स्थित परिवार-नियंत्रित निजी वित्तीय समूह है। किसी आधिकारिक बयान ने इस बैठक को इज़राइल सरकार से नहीं जोड़ा।
4. क्या Rothschild के बारे में "दुनिया पर कब्ज़े" की बातें सच हैं?
नहीं। इतिहासकार और लेखक इन्हें करीब 200 साल पुराना यहूदी-विरोधी मिथक बताते हैं।
5. पाकिस्तान ने यूरोबॉन्ड से कितना पैसा जुटाया?
3 अरब डॉलर। इसमें 1.75 अरब डॉलर 7.50% पर और 1.25 अरब डॉलर 7.90% पर हैं। मांग लगभग 6 अरब डॉलर की थी।
Research & Analysis by Swati Sharma
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