BRICS और Global South: क्या बदल रही है विश्व व्यवस्था?

Sep 15, 2026
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नई दिल्ली में कुछ दिन पहले जो हुआ, वो सिर्फ एक और समिट नहीं था। मोदी, पुतिन और शी जिनपिंग एक साथ हाथ पकड़े खड़े थे। तस्वीर पूरी दुनिया में वायरल हो गई। सवाल यही उठा कि क्या BRICS और Global South मिलकर अमेरिका के दबदबे को चुनौती दे रहे हैं? जवाब आसान नहीं है, लेकिन साफ है। BRICS और Global South अब सिर्फ बातचीत तक सीमित नहीं हैं। ये असल में एक नई विश्व व्यवस्था की नींव रख रहे हैं। आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं।

 

 

BRICS समिट 2026: नई दिल्ली में क्या हुआ?

12 और 13 सितंबर 2026 को भारत ने 18वां BRICS समिट होस्ट किया। जगह थी दिल्ली का भारत मंडपम। यह भारत की चौथी BRICS अध्यक्षता थी। भारत ने 1 जनवरी 2026 से यह जिम्मेदारी संभाली थी। इस साल BRICS और Global South के लिए खास मायने रखता है, क्योंकि यह ग्रुप के 20 साल पूरे होने का मौका भी है। पिछले दो दशकों में BRICS और Global South ने धीरे-धीरे अपनी पहचान मजबूत की है।
समिट की थीम थी, "Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability"। सीधी भाषा में कहें, तो मकसद था साथ मिलकर मुश्किलों से लड़ना और नई तकनीक अपनाना। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे "Humanity First" यानी इंसानियत पहले का नाम दिया। यही सोच BRICS और Global South के हर बड़े फैसले में झलकती है।
मोदी, पुतिन और शी जिनपिंग की इस मुलाकात के पूरे मायने और उसका आम इंसान पर असर, हमने एक अलग रिपोर्ट में विस्तार से बताया है।
(यह भी पढ़ सकते हैं: BRICS Summit 2026: मोदी-पुतिन-शी जिनपिंग की महामुलाकात के मायने, और आम इंसान पर इसका असर)
 

क्यों बन रही है अमेरिका से अलग नई व्यवस्था?

पीएम मोदी ने अपने भाषण में एक बड़ी बात कही। उन्होंने कहा कि BRICS और Global South को "नियम मानने वाले" से "नियम बनाने वाले" बनना होगा। यानी अब ये देश सिर्फ अमेरिका या यूरोप के बनाए नियम नहीं मानेंगे। ये खुद अपने नियम बनाना चाहते हैं।
इसकी एक बड़ी वजह है डॉलर पर निर्भरता कम करना। रूस और चीन अब आपस में करीब 90 प्रतिशत व्यापार रूबल और युआन में करते हैं। BRICS Pay जैसा पेमेंट सिस्टम भी तेज़ी से बढ़ रहा है। इसके अलावा mBridge नाम का एक और सिस्टम भी काम कर रहा है, जिससे चीन, हांगकांग, थाईलैंड और यूएई के केंद्रीय बैंक आपस में सीधा डिजिटल भुगतान कर पाते हैं। रूस का SPFS और चीन का CIPS नेटवर्क भी इसी दिशा में जुड़ रहे हैं। इससे BRICS और Global South के देश अमेरिकी डॉलर पर कम निर्भर हो रहे हैं।
यह सिर्फ पैसों का खेल नहीं है। यह दरअसल एक नई विश्व व्यवस्था की नींव है, जहां फैसले सिर्फ वाशिंगटन में नहीं, बल्कि दिल्ली, बीजिंग, मॉस्को और ब्राज़ीलिया में भी लिए जाएं। सदस्य देशों की संख्या भी बढ़ी है। मिस्र, इथियोपिया, ईरान और यूएई जैसे नए देश जुड़ने से BRICS और Global South का असर पहले से कहीं ज्यादा फैल गया है।
हालांकि भारत का रुख थोड़ा अलग है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने साफ कहा है कि भारत डॉलर को हटाने की नीति नहीं रखता। उनका कहना है कि डॉलर का रिजर्व करेंसी होना दुनिया की आर्थिक स्थिरता के लिए जरूरी है। यह दिखाता है कि BRICS और Global South के अंदर भी हर मुद्दे पर एक जैसी राय नहीं है।
 

अमेरिका की धमकी और टैरिफ का डर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह सब पसंद नहीं आया। उन्होंने कई बार धमकी दी है कि अगर BRICS और Global South देश डॉलर छोड़ने की कोशिश करेंगे, तो उन पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जाएगा। ट्रंप ने यह भी कहा कि BRICS की "एंटी-अमेरिकन" नीतियों का साथ देने वाले देशों पर अलग से 10 प्रतिशत टैरिफ भी लगेगा।
ब्राज़ील के राष्ट्रपति लूला ने इस धमकी का जवाब दिया। उन्होंने कहा, "दुनिया बदल गई है, हमें कोई सम्राट नहीं चाहिए।" यह बयान बताता है कि BRICS और Global South अब दबाव में झुकने को तैयार नहीं हैं। ये देश अपने फैसले खुद लेना चाहते हैं, भले ही अमेरिका नाराज़ हो।
 

पश्चिम एशिया में तनाव और BRICS का रुख

इस साल पश्चिम एशिया में हालात बेहद तनावपूर्ण रहे। फरवरी 2026 में अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर हमला किया। इसके बाद अप्रैल में पाकिस्तान की मध्यस्थता से एक अस्थायी युद्धविराम हुआ। लेकिन तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। बीच-बीच में झड़पें होती रहीं।
(यह भी पढ़ सकते हैं: अमेरिका ईरान युद्धविराम: दोस्ती की असली परीक्षा वाशिंगटन इज़राइल के बीच)
न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन में BRICS और Global South ने साफ कहा कि परमाणु टकराव का खतरा बढ़ रहा है। इसमें युद्ध के दौरान भी परमाणु सुरक्षा बनाए रखने पर जोर दिया गया। यह संदेश सीधा था, अमेरिका और इज़राइल दोनों की तरफ इशारा किए बिना, बातचीत और संयम की अपील की गई।

 


 

आम इंसान पर क्या असर पड़ेगा?

अब सवाल यह है कि इन सब बड़ी बातों का असर आम आदमी पर कैसे पड़ता है। सच यह है कि BRICS और Global South की नीतियां सीधे रसोई और जेब तक पहुंचती हैं।

  • अगर डॉलर पर निर्भरता कम होगी, तो व्यापार सस्ता हो सकता है
  • अगर टैरिफ बढ़ता है, तो आयात-निर्यात महंगा हो सकता है
  • सप्लाई चेन मजबूत होने से सामान की कमी कम होगी
  • छोटे व्यापारियों को नए भुगतान सिस्टम से फायदा मिल सकता है

यानी BRICS और Global South की हर बड़ी बैठक का असर सीधे तेल की कीमत, महंगाई और नौकरियों पर पड़ता है। यह सिर्फ नेताओं की तस्वीर वाली खबर नहीं है। BRICS और Global South की नीतियां आम आदमी की जिंदगी से सीधे जुड़ी हुई हैं।

 

टेक्नोलॉजी और क्रिटिकल मिनरल्स पर नई सोच

पीएम मोदी ने टेक्नोलॉजी और क्रिटिकल मिनरल्स को हथियार बनाने की चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि BRICS और Global South को नई तकनीक बनाने और उसके नियम तय करने में बराबर की भागीदारी चाहिए। यह बात शी जिनपिंग की मौजूदगी में कही गई, जो दुर्लभ खनिजों की सप्लाई चेन को लेकर खासा अहम मानी गई।
मोदी ने एक और नया विचार भी रखा। उन्होंने समुद्री मजदूरों के लिए एक इमरजेंसी सपोर्ट नेटवर्क बनाने का सुझाव दिया। इससे साफ है कि BRICS और Global South अब सिर्फ बड़ी बातें नहीं, बल्कि आम मजदूरों के लिए भी योजना बना रहे हैं।
 

समिट में और कौन-कौन शामिल हुआ?

सिर्फ मोदी, पुतिन और शी जिनपिंग ही नहीं, बल्कि कई और बड़े नेता भी दिल्ली पहुंचे थे। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबिआंतो, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी, और इथियोपिया के प्रधानमंत्री आबी अहमद अली भी समिट में मौजूद रहे। मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने भी हिस्सा लिया।
इतने सारे देशों की मौजूदगी खुद बताती है कि BRICS और Global South अब सिर्फ पांच देशों का ग्रुप नहीं रहा। मिस्र, इथियोपिया, ईरान और यूएई जैसे देश 2024 में इसमें पूरी तरह जुड़ चुके हैं। यानी BRICS और Global South का दायरा हर साल बड़ा होता जा रहा है।
विदेश मंत्रालय के मुताबिक, भारत की अध्यक्षता में पूरे साल 25 से ज्यादा शहरों में 350 से अधिक बैठकें हुईं। इन बैठकों में व्यापार, तकनीक, ऊर्जा और वित्त जैसे विषयों पर चर्चा हुई। यह मेहनत ही असली समिट की जमीन तैयार करती है, और यही मेहनत BRICS और Global South की असली ताकत बनती है।
 

आगे क्या होगा?

भारत के बाद 2027 में BRICS की अगली अध्यक्षता चीन को मिलेगी। यानी BRICS और Global South का यह सफर यहीं नहीं रुकेगा। हर साल नया देश अध्यक्षता संभालता है, और हर बार एजेंडा थोड़ा आगे बढ़ता है।
एक बात साफ है। BRICS और Global South अब सिर्फ एक मंच नहीं, बल्कि दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था का एक नया केंद्र बनते जा रहे हैं। अमेरिका इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता। आने वाले सालों में यह मुकाबला और तेज़ होगा।
भारत के लिए यह मौका और चुनौती, दोनों है। एक तरफ भारत अमेरिका के साथ अपने व्यापारिक रिश्ते मजबूत रखना चाहता है। दूसरी तरफ भारत BRICS और Global South की आवाज़ को भी मजबूती से आगे बढ़ा रहा है। यही संतुलन तय करेगा कि BRICS और Global South की यह नई विश्व व्यवस्था कितनी मजबूत बनती है। यह संतुलन बनाना आसान नहीं, लेकिन भारत की विदेश नीति अभी इसी रास्ते पर चल रही है।
आम पाठक के लिए सीधी बात यह है कि दुनिया की ताकत अब सिर्फ एक जगह नहीं टिकी। BRICS और Global South की बढ़ती भूमिका आने वाले सालों में हर देश की आर्थिक और राजनीतिक चाल तय करेगी।
 

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1: BRICS और Global South का मतलब क्या है? 

BRICS एक ग्रुप है जिसमें भारत, रूस, चीन, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और कुछ नए सदस्य देश शामिल हैं। Global South उन विकासशील देशों को कहा जाता है जो अमेरिका और यूरोप से अलग अपनी आवाज़ उठाना चाहते हैं। BRICS और Global South मिलकर एक नई साझेदारी बना रहे हैं।

 

2: 2026 का BRICS समिट कहां हुआ था? 

यह समिट 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में हुआ। भारत ने इस साल BRICS की अध्यक्षता संभाली थी।

 

3: क्या BRICS डॉलर को खत्म करना चाहता है? 

नहीं, अभी तक ऐसा कोई साफ फैसला नहीं हुआ है। कई देश स्थानीय करेंसी में व्यापार बढ़ा रहे हैं, लेकिन भारत जैसे देश डॉलर को पूरी तरह हटाने के पक्ष में नहीं हैं।

 

4: अमेरिका BRICS से नाराज़ क्यों है? 

अमेरिका को डर है कि BRICS और Global South डॉलर का दबदबा कम कर सकते हैं। इसी वजह से राष्ट्रपति ट्रंप ने कई बार भारी टैरिफ लगाने की धमकी दी है।

 

5: BRICS और Global South का आम आदमी पर क्या असर होगा? 

इसका असर व्यापार, तेल की कीमत, और रोजमर्रा के सामान पर पड़ता है। अगर नई व्यवस्था कामयाब होती है, तो आम लोगों को सस्ता व्यापार और बेहतर सप्लाई चेन का फायदा मिल सकता है।
 

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लेखक एवं विश्लेषण

Swati Sharma

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