एक तरफ इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू हैं। दूसरी तरफ ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन। दोनों देशों के बीच तनाव है। फिर भी भारत दोनों से संपर्क बनाए हुए है। यही वजह है कि ग्लोबल लीडर मोदी की विदेश नीति पर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है।
भारत की यह नीति किसी एक देश के पक्ष में खड़े होने की नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने की है। साल 2026 में भारत BRICS की अध्यक्षता कर रहा है। इसी दौरान भारत ने इज़राइल और ईरान, दोनों के साथ अपने रिश्तों को अलग-अलग स्तर पर आगे बढ़ाया है। यह भारत की कूटनीतिक क्षमता का बड़ा उदाहरण माना जा रहा है।
नेतन्याहू के साथ रिश्तों का नया दौर
26 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इज़राइल का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ आधिकारिक बातचीत की। भारत और इज़राइल ने अपने संबंधों को “शांति, नवाचार और समृद्धि के लिए विशेष रणनीतिक साझेदारी” तक बढ़ाने का फैसला किया। यह जानकारी भारत के विदेश मंत्रालय के संयुक्त बयान में दी गई है।
दोनों देशों ने रक्षा, सुरक्षा, तकनीक, कृषि, पानी, व्यापार और निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की। भारत के लिए इज़राइल रक्षा तकनीक, कृषि नवाचार और जल प्रबंधन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण साझेदार है।
यह रिश्ता केवल नेताओं की व्यक्तिगत दोस्ती तक सीमित नहीं है। दोनों देशों के बीच कई वर्षों से रक्षा और तकनीकी सहयोग चल रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी इज़राइल यात्रा से पहले कहा था कि भारत और इज़राइल विज्ञान, तकनीक, कृषि, जल प्रबंधन, रक्षा और व्यापार में सहयोग को और मजबूत करना चाहते हैं।
अगस्त 2026 में नेतन्याहू और मोदी के बीच फोन पर भी बातचीत हुई। दोनों नेताओं ने भारत-इज़राइल विशेष रणनीतिक साझेदारी की प्रगति की समीक्षा की और सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई।
इन घटनाओं से साफ है कि ग्लोबल लीडर मोदी इज़राइल के साथ रिश्तों को भारत की सुरक्षा और विकास जरूरतों से जोड़कर देख रहे हैं।
पेजेशकियन से बातचीत का संदेश
भारत ने ईरान के साथ भी संवाद का रास्ता खुला रखा है। 31 अगस्त 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिश्केक में SCO शिखर सम्मेलन के दौरान ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से मुलाकात की। विदेश मंत्रालय के अनुसार, दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों और पश्चिम एशिया के हालिया घटनाक्रम पर चर्चा की।
11 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन से अलग दोनों नेताओं की फिर मुलाकात हुई। विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह दो सप्ताह से कम समय में उनकी दूसरी बैठक थी। बातचीत में द्विपक्षीय संबंधों और पश्चिम एशिया की स्थिति पर विचार साझा किए गए।
इस मुलाकात से जुड़ा एक दृश्य भी चर्चा में रहा। मोदी और पेजेशकियन साथ-साथ चलते दिखाई दिए और कुछ तस्वीरों में दोनों नेताओं के बीच सहजता नजर आई। यह दृश्य अपने आप में कोई नीति या समझौता साबित नहीं करता। फिर भी, यह भारत और ईरान के बीच खुले संवाद और राजनीतिक संपर्क का संकेत जरूर देता है।
दोनों नेताओं का साथ चलना यह दिखाता है कि भारत कठिन क्षेत्रीय माहौल में भी बातचीत का रास्ता बंद नहीं करना चाहता। भारत इज़राइल के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को आगे बढ़ा रहा है। साथ ही, ईरान के साथ भी सम्मान और संवाद बनाए हुए है।
प्रधानमंत्री मोदी ने क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर चिंता जताई। उन्होंने भारत की लगातार कही जाने वाली बात दोहराई कि विवादों का समाधान बातचीत और कूटनीति से होना चाहिए। उन्होंने स्थायी शांति और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए प्रयास जारी रखने की जरूरत पर भी जोर दिया।
यहां “हाथ पकड़कर चलने” के दृश्य को भारत की संतुलित कूटनीति के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि, इसे किसी औपचारिक सैन्य या राजनीतिक गठजोड़ का प्रमाण नहीं कहा जा सकता। भारत का आधिकारिक रुख संबंधों, संवाद और राष्ट्रीय हित पर आधारित है।
भारत और ईरान ने BRICS तथा SCO जैसे बहुपक्षीय मंचों पर मिलकर काम करने की इच्छा भी जताई। प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति पेजेशकियन को BRICS शिखर सम्मेलन के लिए भारत आने का निमंत्रण दिया था।
यही संतुलन ग्लोबल लीडर मोदी की कूटनीति को अलग बनाता है। भारत इज़राइल से रक्षा और तकनीकी सहयोग कर रहा है। साथ ही, ईरान से संपर्क रखकर पश्चिम एशिया में संवाद और क्षेत्रीय स्थिरता का समर्थन कर रहा है।
BRICS 2026 में भारत की बड़ी भूमिका
भारत 2026 में BRICS की अध्यक्षता कर रहा है। 18वां BRICS शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित किया जा रहा है।
भारत की अध्यक्षता का विषय है “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability.” इसका अर्थ है कि BRICS देश मजबूती, नवाचार, सहयोग और टिकाऊ विकास पर ध्यान दें।
भारत की BRICS अध्यक्षता में ईरान एक सदस्य देश के रूप में शामिल है। फरवरी 2026 में BRICS शेरपाओं की बैठक में ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है। इज़राइल BRICS का सदस्य नहीं है। इसलिए भारत का इज़राइल के साथ संबंध BRICS मंच के बाहर द्विपक्षीय स्तर पर है। वहीं ईरान के साथ भारत के संबंध द्विपक्षीय होने के साथ-साथ BRICS और SCO जैसे मंचों पर भी आगे बढ़ रहे हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि भारत इज़राइल और ईरान को एक ही मंच पर समान भूमिका दे रहा है। सही बात यह है कि भारत दोनों देशों के साथ अपने-अपने हितों के आधार पर संबंध बनाए रख रहा है। यही नीति भारत को कठिन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में विकल्प देती है।
यह भारत की जीत क्यों मानी जा रही है?
भारत की सबसे बड़ी ताकत संवाद बनाए रखना है। पश्चिम एशिया में जब तनाव बढ़ता है, तब कई देश खुले तौर पर किसी एक पक्ष का समर्थन करते हैं। भारत ने इसके बजाय अपने हितों और शांति के सिद्धांतों को साथ लेकर चलने की कोशिश की है।
इज़राइल भारत के लिए रक्षा, सुरक्षा और तकनीक में महत्वपूर्ण है। ईरान भारत के लिए पश्चिम एशिया और मध्य एशिया तक संपर्क, व्यापार और ऊर्जा से जुड़ा अहम देश है। ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारत की भागीदारी भी दोनों देशों के संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इस संतुलन से भारत को कई लाभ मिल सकते हैं:
- भारत अलग-अलग देशों से व्यापार और तकनीकी सहयोग जारी रख सकता है।
- पश्चिम एशिया में भारतीय नागरिकों और व्यापारिक हितों की सुरक्षा पर बातचीत कर सकता है।
- BRICS और SCO जैसे मंचों पर अपनी भूमिका मजबूत कर सकता है।
- किसी एक शक्ति पर पूरी तरह निर्भर रहने से बच सकता है।
- वैश्विक मुद्दों पर स्वतंत्र नीति रख सकता है।
इसीलिए ग्लोबल लीडर मोदी का नाम भारत की सक्रिय विदेश नीति के साथ जोड़ा जा रहा है। हालांकि “मास्टरस्ट्रोक” एक राजनीतिक या विश्लेषणात्मक शब्द है। किसी नीति की असली सफलता उसके लंबे समय के परिणामों से तय होगी।
संतुलन के साथ चुनौतियां भी
भारत की नीति आसान नहीं है। इज़राइल और ईरान के बीच तनाव बढ़ने पर नई दिल्ली के लिए संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। किसी भी बयान या फैसले को दोनों पक्ष अलग-अलग नजर से देख सकते हैं।
भारत को अपनी नीति में तीन बातों का ध्यान रखना होगा। पहली, राष्ट्रीय हित। दूसरी, भारतीय नागरिकों और व्यापार की सुरक्षा। तीसरी, अंतरराष्ट्रीय कानून और बातचीत के समर्थन की अपनी घोषित नीति।
ग्लोबल लीडर मोदी की कूटनीति तभी सफल मानी जाएगी, जब भारत संबंधों को केवल नेताओं की मुलाकातों तक सीमित न रखकर ठोस आर्थिक, तकनीकी और सुरक्षा सहयोग में बदल सके।
निष्कर्ष
नेतन्याहू से मुलाकात और पेजेशकियन के साथ लगातार बातचीत भारत की व्यावहारिक विदेश नीति दिखाती है। BRICS 2026 की अध्यक्षता ने इस नीति को बड़ा मंच दिया है। भारत इज़राइल के साथ विशेष रणनीतिक साझेदारी बढ़ा रहा है और ईरान के साथ संवाद तथा बहुपक्षीय सहयोग जारी रख रहा है।
इसलिए ग्लोबल लीडर मोदी की नीति को किसी एक देश के समर्थन के रूप में नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रीय हितों पर आधारित संतुलित कूटनीति के रूप में समझना चाहिए। यह भारत के लिए अवसर भी है और बड़ी जिम्मेदारी भी।
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FAQs
1. भारत इज़राइल के साथ संबंध क्यों बढ़ा रहा है?
भारत इज़राइल के साथ रक्षा, सुरक्षा, कृषि, जल प्रबंधन, तकनीक और व्यापार में सहयोग करता है। दोनों देशों ने 2026 में संबंधों को विशेष रणनीतिक साझेदारी तक बढ़ाया।
2. भारत ईरान के साथ संवाद क्यों बनाए हुए है?
ईरान पश्चिम एशिया में भारत का महत्वपूर्ण साझेदार है। दोनों देशों के बीच व्यापार, संपर्क और क्षेत्रीय मुद्दों पर सहयोग है। भारत चाबहार बंदरगाह से भी जुड़ा है।
3. क्या इज़राइल BRICS का सदस्य है?
नहीं। 2026 में ईरान BRICS का सदस्य है, जबकि इज़राइल BRICS का सदस्य नहीं है।
4. BRICS 2026 की अध्यक्षता कौन कर रहा है?
भारत BRICS की 2026 की अध्यक्षता कर रहा है। 18वां शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में हो रहा है।
5. भारत पश्चिम एशिया के तनाव पर क्या कहता है?
भारत का आधिकारिक रुख है कि क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान बातचीत और कूटनीति से होना चाहिए। भारत स्थायी शांति, स्थिरता और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा का समर्थन करता है।